दारीयस खंबाटा ने टाटा सन्स के नेतृत्व निर्णय की आलोचना की

दारीयस खंबाटा का टाटा ट्रस्ट से इस्तीफा चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर चिंता को उजागर करता है।

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Aapla Nagpur Desk
3 Nov 2026, 6:06 AM IST · 2 मिनट वाचन
Source: The Hindu
दारीयस खंबाटा ने टाटा सन्स के नेतृत्व निर्णय की आलोचना की
खास बातें
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खंबाटा का कहना है कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति से टाटा सन्स की प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ है।

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इस निर्णय ने टाटा ट्रस्ट के बोर्ड सदस्यों के बीच विभाजन को जन्म दिया है।

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रतन टाटा का पुनर्नियुक्ति के खिलाफ होना कॉर्पोरेट शासन पर सवाल उठाता है।

एक महत्वपूर्ण विकास में, दारीयस खंबाटा, जो टाटा ट्रस्ट के बोर्ड के सदस्य के रूप में इस्तीफा दे रहे हैं, ने टाटा सन्स बोर्ड के चंद्रशेखरन की तीसरी बार अध्यक्ष के रूप में पुनर्नियुक्ति के निर्णय की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है। खंबाटा ने टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष नील टाटा को लिखे पत्र में कहा कि 17 सितंबर, 2026 के घटनाक्रम ने टाटा सन्स की प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया है और कॉर्पोरेट भारत की छवि को खतरे में डाल दिया है।

खंबाटा की टिप्पणियाँ उस विवादास्पद बोर्ड बैठक के बाद आई हैं जहाँ पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दी गई थी। उन्होंने कहा कि इस निर्णय के नतीजों को छिपाने के लिए जनसंपर्क के किसी भी प्रयास का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या बोर्ड ने ऐसा निर्णय लिया होता यदि रतन टाटा, पूर्व अध्यक्ष, अभी जीवित होते, यह संकेत करते हुए कि यह निर्णय संगठन के शासन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

पत्र में टाटा ट्रस्ट के भीतर आंतरिक विभाजन को भी उजागर किया गया है, जिसमें खंबाटा ने नील टाटा के साथ पुनर्नियुक्ति के खिलाफ समर्थन किया है। उन्होंने उल्लेख किया कि अन्य बोर्ड सदस्य, विजय सिंह और वीनू श्रीनिवासन, संभावित शेयर बिक्री के पक्ष में हैं, जो ट्रस्टों की भविष्य की रणनीति के संबंध में एक दरार को दर्शाता है। खंबाटा का कार्यकाल नवंबर में समाप्त होने वाला था, और उनका इस्तीफा अन्य बोर्ड सदस्यों से अपेक्षित विरोध के कारण प्रतीत होता है।

इस स्थिति के प्रभाव केवल आंतरिक शासन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह टाटा सन्स के भविष्य के दिशा-निर्देश और सार्वजनिक छवि पर भी सवाल उठाते हैं। सर रतन टाटा ट्रस्ट पर चल रहा नियामक प्रतिबंध स्थिति की जटिलता को बढ़ाता है, क्योंकि ट्रस्ट के पास कॉर्पोरेट निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता सीमित है। खंबाटा का इस्तीफा और इसके चारों ओर का विवाद टाटा सन्स में हितधारकों के विश्वास पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।

आगे देखते हुए, टाटा ट्रस्ट को इन आंतरिक संघर्षों और सार्वजनिक धारणाओं को सावधानीपूर्वक नेविगेट करना होगा। आने वाले महीनों में टाटा सन्स के शासन संरचना और रणनीतिक दिशा पर आगे की चर्चाएँ देखने को मिल सकती हैं, विशेष रूप से जब संगठन अपनी विरासत को बनाए रखने के साथ-साथ आधुनिक कॉर्पोरेट चुनौतियों का सामना कर रहा है।

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