सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए आरक्षण पर निर्णय सुनाया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो लोग गैर-हिंदू धर्मों में परिवर्तित होते हैं, वे अपने पूर्व-परिवर्तन स्थिति के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकते।

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Aapla Nagpur Desk
15 Oct 2026, 11:24 AM IST · 2 मिनट वाचन
Source: Livelaw
सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए आरक्षण पर निर्णय सुनाया
खास बातें
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सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।

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गैर-हिंदू धर्म में परिवर्तित होने पर पूर्व जाति के लाभ समाप्त हो जाते हैं।

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तमिलनाडु सरकार का आदेश असंवैधानिक घोषित किया गया।

15 अक्टूबर 2026 को, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया जिसमें कहा गया कि जो लोग गैर-हिंदू धर्मों में परिवर्तित होते हैं, वे अपने पूर्व-परिवर्तन जाति या समुदाय की स्थिति के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकते। यह निर्णय मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णय को बरकरार रखते हुए दिया गया, जिसमें कहा गया था कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की जाति स्थिति नहीं बदलती। यह निर्णय न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ द्वारा सुनाया गया।

यह मामला समीर अहमद द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ, जिन्होंने 2015 में हिंदू धर्म से इस्लाम में परिवर्तन किया। अपने धर्म परिवर्तन के बाद, अहमद ने मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का सदस्य होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया, जिससे उन्हें आरक्षण लाभ मिल सके। हालांकि, उनके आवेदन को तहसीलदार द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने कानूनी चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के कारण पूर्व जाति के लाभ समाप्त हो जाते हैं।

कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले, जिसमें कहा गया कि गैर-हिंदू धर्म में परिवर्तित व्यक्ति केवल अपनी पूर्व जाति स्थिति के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकते। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जातियाँ) आदेश पर आधारित है, जो कहता है कि जो लोग हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानते हैं, वे अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं माने जा सकते।

यह निर्णय तमिलनाडु और उसके बाहर सामाजिक और कानूनी परिदृश्य पर व्यापक प्रभाव डालता है। यह इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि जाति से जुड़े सामाजिक पहचान और लाभ धर्म परिवर्तन के बाद स्थानांतरित नहीं होते। तमिलनाडु सरकार का पूर्व आदेश, जो धर्म परिवर्तन करने वालों को मुस्लिम पिछड़ी जातियों के रूप में मान्यता देने की अनुमति देता था, असंवैधानिक घोषित किया गया है।

आगे देखते हुए, तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को चुनौती देने के लिए विशेष अनुमति याचिका दायर की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह मुद्दा न्यायिक प्रणाली के माध्यम से विकसित होता रहेगा। इस मामले का परिणाम भारत में धर्म, जाति और सकारात्मक कार्रवाई के बीच के संबंधों पर महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।

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