बिभा चौधुरी का 1939 में कॉस्मिक रे फोटोग्राफी में योगदान

1939 में, भौतिक विज्ञानी बिभा चौधुरी ने फोटोग्राफिक प्लेटों का उपयोग करके कॉस्मिक रे को देखने की एक नई विधि विकसित की, जो कण भौतिकी में एक महत्वपूर्ण प्रगति थी।

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Aapla Nagpur Desk
17 Oct 2026, 11:30 AM IST · 3 मिनट वाचन
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बिभा चौधुरी का 1939 में कॉस्मिक रे फोटोग्राफी में योगदान
खास बातें
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बिभा चौधुरी ने 1939 में कॉस्मिक रे पर महत्वपूर्ण शोध प्रकाशित किया।

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उनके प्रयोगों ने नाभिकीय विघटन के 30 ट्रैक को दर्शाया।

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चौधुरी का काम भौतिकी में कण पहचान विधियों के विकास में सहायक रहा।

1939 में, 26 वर्षीय भौतिक विज्ञानी बिभा चौधुरी ने कण भौतिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया जब उन्होंने फोटोग्राफिक प्लेटों के साथ अपने नवोन्मेषी प्रयोगों का विवरण प्रस्तुत किया। कोलकाता और सैंडकफू जैसे स्थानों में किए गए उनके प्रयोगों का उद्देश्य कॉस्मिक रे के अंशों को उजागर करना था, जो अन्यथा आंखों से अदृश्य थे। समेरियम सल्फेट से उपचारित फोटोग्राफिक प्लेटों को विभिन्न वातावरणों में रखकर, चौधुरी ने नाभिकीय विघटन के प्रमाण कैद किए, जिससे 30 विशिष्ट ट्रैक की खोज हुई जो तारे के समान दिखाई देते थे।

चौधुरी के प्रयोग उस समय के व्यापक वैज्ञानिक आंदोलन का हिस्सा थे, जो उपपरमाणु घटनाओं के लिए फोटोग्राफिक इमल्शन का उपयोग करने की कोशिश कर रहा था। कोलकाता के बोस संस्थान में प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी डीएम बोस के साथ उनका सहयोग महत्वपूर्ण था। उन्होंने मिलकर फोटोग्राफिक प्लेटों पर छोड़े गए ट्रैक के आधार पर विभिन्न कणों के बीच अंतर करने के तरीके विकसित किए। यह काम न केवल चौधुरी के करियर को आगे बढ़ाने में मददगार रहा, बल्कि भविष्य के शोध के लिए भी आधार तैयार किया, जिसमें सिसिल पॉवेल के नोबेल पुरस्कार विजेता अध्ययन शामिल हैं।

चौधुरी द्वारा अपनाई गई विधि उस समय के लिए अत्याधुनिक थी। फोटोग्राफिक प्लेटों के एक्सपोजर समय को बढ़ाकर, वह नाभिकीय विघटन की दुर्लभ घटनाओं को कैद करने में सक्षम थीं, जो पारंपरिक विधियों से संभव नहीं था। उनके शोध ने कॉस्मिक रे-प्रेरित घटनाओं का पता लगाने में फोटोग्राफिक इमल्शन की प्रभावशीलता को प्रदर्शित किया, जिससे कण भौतिकी प्रयोगों में एक बदलाव आया। चौधुरी के निष्कर्षों की पुष्टि पहले के अध्ययनों ने की, जिससे उनके काम की विश्वसनीयता बढ़ी।

चौधुरी के शोध के प्रभाव उनके तत्काल निष्कर्षों से परे फैले। कॉस्मिक रे और पदार्थ के बीच अंतःक्रियाओं को देखने की उनकी क्षमता ने मौलिक कणों को समझने के नए रास्ते खोले। इससे न केवल भारत में कण भौतिकी के क्षेत्र में योगदान मिला, बल्कि भारतीय वैज्ञानिकों को वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में प्रमुख स्थान पर भी रखा। उन्होंने जो तकनीकें विकसित कीं, वे उपपरमाणु कणों का पता लगाने और विश्लेषण करने के लिए भविष्य के शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

आगे देखते हुए, चौधुरी की विरासत नई पीढ़ियों के भौतिकविदों को प्रेरित करती रहेगी। कॉस्मिक रे फोटोग्राफी में उनका अग्रणी कार्य विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बना हुआ है, जो अनुसंधान में नवोन्मेषी दृष्टिकोण के महत्व को उजागर करता है। जैसे-जैसे कण भौतिकी का क्षेत्र विकसित होता है, चौधुरी और उनके समकालीनों द्वारा स्थापित बुनियादी तकनीकें भविष्य की खोजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

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